तनखा

November 2, 2009

तन खा कर तनखा मिलती है,तनखा को तन खा जाता है,
तनखा जब कर में आती है,तन खा से मन अन खा जाता है.

तनखा के मिलने से पहले,अधिकार आरक्षित होते हैं,
कर्तव्य आहें भरता है,आश्वास्सन बाधित होते हैं .

तनखा के कर में आते ही,मांगों की पुकारें आती हैं,
मांग न हो पातीं पूरी,पुकारें तन खा जाती हैं .

तनखा वह श्रम की खेती है,सीमित बोऒ सीमित काटो,
इस मासिक फसल के कटते ही,प्रसाद सा सबको बांटो.

नववर्ष की पावन बेला पर,पत्नी ने की कुछ फरमाइस,
चलो पिया तुम हमें दिखा दो, फूल बाग में लगी नुमाइश.

जब से बजट हुआ है घोषित,कभी न की कोई फरमाइस,
कल शादी की वर्षगांठ है,करो पिया तुम पूरी ख्वाइस .

राजदूत से जाना होगा,मेघदूत में खाना होगा ,
प्रेमनगर का पान चबाकर,प्रेम दूत बन जाना होगा.

पेंग बढ़ाकर झूले होंगे, आसमान को छूते होंगे,
ऊंचा वाला झूला झूलेंगे,क्षण भर को दुखड़े भूलेंगे.

कुआं मौत का देखेंगे हम,उड़ता हुआ धुआं देखेंगे,
चारो ओर हों खेल तमाशे,बैठ खायेंगे चाट-बतासे.

पंजाबी एक सूट सिला दो,हाई हील का बूट दिला दो,
जयपुर वाला लंहगा ले दो,सस्ता नहीं कुछ मंहगा ले दो.

पप्पू की जिद पूरी कर दो,ले दो,दो पहिये की गाड़ी,
कब से आस लगाये हूं मैं,पिया दिला दो सिल्क की साड़ी.

कल शादी की वर्षगांठ पर,मुझको क्या दोगे उपहार,
या फिर मुझको बहला दोगे,डाल गले में बाहों का हार.

बन्द करो अपनी फरमाइस,ना जाना है हमें नुमाइस,
जितनी पूरी करते आओ,उतना बढ़ती जाती ख्वाइस.

नयावर्ष हैं वही मनाते,जिनका साल गया उन जैसा,
वर्षगांठ हैं वही मनाते ,जिनकी गांठ में होता पैसा.

अपनी तो है श्वेत कमाई,दो नंबरी मत बात करो तुम,
चादर से मत पैर निकालो,आडंबर की मत बात करो तुम.

लक्ष्मण रेखा सी बंधी हुई, है मेरी तनखा सीता .
मत आमंत्रण दो मंहगे रावण को,अपहृत हो जायेगी सीता.

प्यार भाव वाचक संज्ञा है,एहसासों की पावन गंगा है,
मत आंको इसे उपहारों से,दूषित होगी मनभावन गंगा है.

मेरे पास न सोना-चांदी,न है धन खान रतन ,
मैं तो केवल प्रेम पुजारी,अर्पित तुझ पर निर्मल मन.

कोई भौतिक चाह नहीं है,न मन में कोई और लगन,
बस यही कामना ईश्वर से,साथ रहें हम जनम-जनम.

अंतिम बात तुम्हें समझाता,ओ मेरे दिल की रानी ,
याद रखो तुमजयकी बानी,उतना उतरो जितना पानी.

 Credit: By Some Writer


इंजीनियर वो है

September 17, 2009

इंजीनियर वों हैं
जो अक्सर फसता है
साझात्कर के सवाल मे
बड़ी कम्पनी के जाल मे
बासँ और कलाइँट के बवाल मे,
इंजीनियर वो हैं,
जो पक गया है,
मीटिंग की झेलाई मे,
सबमिसन की गहराई मे,
टीमवर्क की चटाइँ मे
इंजीनियर वो हैं,
जो लगा रहता है,
सिडुयुल को फिसलाने मे
टार्गेट्स को खिसकाने मे
रोज़ नए नए बहाने बनाने मे
इंजीनियर वो हँ
जो लंच टाइम मे ब्रेंकफास्ट लेता है
डिनर टाइम मे लंच करता है , और
कोम्मुटेशन के वक्त सोया करता है
इंजीनियर वोह है
जो पागल है
चाय और समोसें के प्यार मे
सिगरेट के खुमार मे
बँढ्वाचिंग के विचार मे
इंजीनियर वो है
जो खोया है
रिमान्ड्र्सँ के जवाब मे
न मिलने वाले हिसाब मे
बेहतर भविष्य के ख्वाब मे
इंजीनियर वो है
जिसे इंतज़ार है
वीकएंड नाइट पर धूम मचने का
बॉस के छूटी पर जाने का
इन्क्रीमेंट की ख़बर आने का
इंजीनियर वो हँ i
जो सोचता है
काश पढ़ाई पर ध्यान दिया होता
काश टीचर से पंगा न लिया होता
काश इश्क न किया होता

Credit: Mail Forwarded


तुम्हारी बहुत याद आती है

September 12, 2009
दीपक के लौ की तरह,
झिलमिलाती , टिमटिमाती
अंधेरी घनेरी रातों में
तुम्हारी बहुत याद आती है ।

ये कायनात सारी घुप्प अंधेरे में
चुप-सी रहती है,
केवल बैताल-सी साँय-2 कर हवा  चलती है  ,
कभी-कभी—–

मखमली-सी सेज पर ठंडी-बासी  सी,
मुर्दानगी छायी रहती है ।
इस तन्हाई में करवट बदलते-2
मेरी कमर मुझसे रुठ-सी गयी है ।

पहले कितना अच्छा लगता था
जब यही मेरी प्यारी कमर
नितांत एकांत में, तुम्हारी कमर से
अठखेलियाँ किया करती थी ।
हमारे- तुम्हारे उन्मुक्त तरंगों को
महकती सासों को एक करती थी ।

वही कमर अब बेगानी हो गयी है,
उसने थिरकना भी छोड. दिया है ,
अब मचलती भी नही,
खामोशी-से खिझकर
मेरी तन्हाई पर वह भी
मुँह फेर लेती है,
और मुझ पर हँसती है ।

कभी-2 मुझे लगता है
मेरी कमर ही मेरी फतह पर जश्न मनाएगी

सुबह को उठता हूँ तो
तुम्हारा रात में न होना
आर-पार तक चीर जाता है ।


यूं तो बालकनी कि खिडकी से झाकनें पर,
बाहर बहुत ही रेलम-पेल नजर आता है,
लोग भागते से नजर आते हैं ।
पर, तुम्हारे न होने से ,चारों तरफ,दर्द भरी तन्हाई का,
कुहासा दिन रात नजर आता है ।

सुबह से शाम यूं ही मायूसी में
बरसाती पानी की तरह उदास बित जाता है ।
फिर वही रात की नीरस खामोशी
काट खाने दौडती है–

सोचता हूँ इस तन्हाई में कुछ नज्म गाऊँ
पर, दिल रो-2 कर दर्द भरे नगमें
गुनगुनाने लगता है ।

कभी-2 सपने में बडबडाने लगता हूँ-
देखता हूँ,तुम्हे खिंच कर ले जा रहा है कोई
मुझसे दूर, बहुत दूर–
मैं हडबडाकर उठ बैठता हूँ,
तो फिर वही ठँडा बिस्तर
वही भयानक खामोशी ।

पहले तुम जब मिलती थी तो,
मेरी आँखें खुशी से बरस उठती थी
अब तो उनसे खुन टपकता है ।
मेरे अंतर में जो घाव है
वह जब बजबजाकर रिसने लगता है
तो,मेरा दिल चित्कार उठता है

मुझे मेरे दिल का रोना, कराहना
और धडकन का काँपना-थऱथऱाना
साफ सुनाई देता है ।
अब तक तो तुम्हारे इंतजार की परीक्षा में,
मैं पास होता रहा–
गर अब परीक्षा लोगी,
तो हार जाऊँगा …

मुझे इन तन्हाईयों  से कोई सारोकार  नहीं
अब तुम आ जाओ……
क्योंकि,तुम्हारी बहुत याद आती है !

Regards,
Holy~Devil

भैंस चालीसा

July 21, 2009

भैंस चालीसा

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महामूर्ख दरबार में, लगा अनोखा केस
फसा हुआ है मामला, अक्ल बङी या भैंस
अक्ल बङी या भैंस, दलीलें बहुत सी आयीं
महामूर्ख दरबार की अब,देखो सुनवाई
मंगल भवन अमंगल हारी- भैंस सदा ही अकल पे भारी
भैंस मेरी जब चर आये चारा- पाँच सेर हम दूध निकारा
कोई अकल ना यह कर पावे- चारा खा कर दूध बनावे
अक्ल घास जब चरने जाये- हार जाय नर अति दुख पाये
भैंस का चारा लालू खायो- निज घरवारि सी.एम. बनवायो
तुमहू भैंस का चारा खाओ- बीवी को सी.एम. बनवाओ
मोटी अकल मन्दमति होई- मोटी भैंस दूध अति होई
अकल इश्क़ कर कर के रोये- भैंस का कोई बाँयफ्रेन्ड ना होये
अकल तो ले मोबाइल घूमे- एस.एम.एस. पा पा के झूमे
भैंस मेरी डायरेक्ट पुकारे- कबहूँ मिस्ड काल ना मारे
भैंस कभी सिगरेट ना पीती- भैंस बिना दारू के जीती
भैंस कभी ना पान चबाये – ना ही इसको ड्रग्स सुहाये
शक्तिशालिनी शाकाहारी- भैंस हमारी कितनी प्यारी
अकलमन्द को कोई ना जाने- भैंस को सारा जग पहचाने
जाकी अकल मे गोबर होये- सो इन्सान पटक सर रोये
मंगल भवन अमंगल हारी- भैंस का गोबर अकल पे भारी
भैंस मरे तो बनते जूते- अकल मरे तो पङते जूते

 

Credit : My Inbox


तुम आई हो

August 16, 2008

“खिड़की का परदा हिलता है और लगता है तुम आई हो
जब जब दिल धड़कता है लगता है तुम्ही समायी हो

मेरी सांसो जी गर्मी में, गीतों में ,गजल, तरानो में
नयनों के उमंगो में या उनके घायल क्रंदन में
मेरी मदहोश तरंगों में, रग रग में तुम्ही समाई हो
मेरे ख्वाबो के सावन में तुम रिमझिम बनकर आई हो

नए शहर में जब मैं आया तुम बिन बहुत अकेला था
ख़ुद में मैं था लीं मगर तुम्हरी यादों का मेला था
हर चेहरे में तुमको ढूंढा,भीड़ में ख़ुद को तनहा पाया
एक झलक तुम्हरी मिल जाती, पल पल ताकता आस लगाया

पुरवा की बयार से पूछा, हर मौसम से हाल तुम्हारा
चाँदनी रातों से पूछा, पंछी से पूछा पता तुम्हारा
हर अनजाने चेहरे में तुम्हारी ही तलाश रही
सपनो में तुम आओगी, इतनी बाकी आस रही.

जब भी सुंदर नयनो से मेरी नयने टकराई
बलखाती अठखेलियों वाली,बस तुम ही तो याद आई

भीड़ में तनहा खड़ा हुआ एक मधुर संगीत सुना
मन यूँ चंचल हो बैठा,जैसे की तुमने गया हो

1st क्लास की खिड़की से महिला डब्बा को निहारता हूँ
टिकेट खिड़की की कतारों में पल पल तुमको ढूंढ़ता हूँ
एक दिन यु बस में बैठा,एक भीनी सुगंध हवा ने लायी
आँखे छल छल हो बैठी शायद तुम हो अब आई

internet पर जब भी बैठा तुम्हारा नाम ढूंढ़ता रहा
एक असीम बिश्वास से तुमको ही पूजता रहा
जब भी आँखे उनींदी होती, सपनो को बुलाता हूँ
सपनो में तुम आती हो, अद्भुत सुख में पता हूँ

हर दर्द में खुसी में बस तुमको ही मैं गाता हूँ
जीवन के हर अहसास में तुमको ही निभाता हूँ

इस जीवन का मोल न जानू तुम बिन बहुत अधुरा हूँ
तुम ही मेरा आदि -अंत हो तुमसे ही मैं पुरा हूँ “

(written on: 16 Aug 2008

Completed on: 16 Feb 2009)

Cheers

Holy-Devil


प्रेरणादायक कविताये

April 30, 2008

जब नाव जल में छोड़ दी
तूफ़ान ही में मोड़ दी
दे दी चुनौती सिंधु को
फ़िर धार क्या मझधार क्या ??

……………………………

वह प्रदीप जो दिख रहा है
झिलमिल दूर नही है
थक कर बैठ गए क्यों भाई
मंजिल दूर नही है .

………………………….

जो बीत गई सो बात गई
माना वह बेहद प्यारा था
जो डूब गया सो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
क्या अनगिन टूटे तारो पर
कब अम्बर शोक मनाता है

………………………….

खोता कुछ भी नही यहा पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतर चांदनी
पहने सुबह धुप की धोती .

……………………….

यह अरण्य झुरमुट जो काटे, अपनी राह बना ले
कृतदास यह नही किसी का जो चाहे अपना ले
जीवन उनका नही उधिस्थिर जो उससे डरते हैं
ओ उनका जो चरण रोप निर्भय होकर लड़ते हैं .

………………………

सूरज हूँ जिंदगी की रमक छोड़ जाऊंगा
मैं डूब भी गया तो सबक छोड़ जाऊंगा

…………………………..

कोिशश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है.
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है.
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है.
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में.
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो.
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्श का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम.
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

->By Harivansh Rai Bachchan

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कुछ लघु कवितायें

April 10, 2008

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प्रेम निमंत्रण

यह प्रेम निमंत्रण करता हूँ
ये सजनी तुम स्वीकार करो
पनघट को छोड़ राधा आवो
इस मुरारी से श्रृंगार करो
इस प्रेम पुंज की लौ को आवो
हम मिलकर कुछ तेज करें
यह प्रेम दिवस है आवो
हम मिलकर प्रेम अनंत हरें.

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रूप रंग

इन्द्रधनुष ने सातों रंग दीए
चंदन ने सुगंध दी देह को
और परियों सा रूप लिए
मेरी महबूबा जमीं पर आई
ऐसा रूप जिसे देख कर
ना जाने कितने कलमें पढ़ दीए जायें
फ़िर भी न जाने क्यों ऐसा लगता है
जैसे बात अभी अधूरी है ….

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मेरा चरित्र

यह चरित्र है मेरा कलंक में सना
न जाने कौन से मिटटी से मैं बना
हर बार सोचता हूँ अब पाक हो जाऊँ
पागल उस ने बनाया कैसे मैं सजाऊं
वो माफ़ करदे मुझको तक़दीर बदल लूँ
कालिख में पुती ये तस्वीर बदल लूँ

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