तन खा कर तनखा मिलती है,तनखा को तन खा जाता है,
तनखा जब कर में आती है,तन खा से मन अन खा जाता है.
तनखा के मिलने से पहले,अधिकार आरक्षित होते हैं,
कर्तव्य आहें भरता है,आश्वास्सन बाधित होते हैं .
तनखा के कर में आते ही,मांगों की पुकारें आती हैं,
मांग न हो पातीं पूरी,पुकारें तन खा जाती हैं .
तनखा वह श्रम की खेती है,सीमित बोऒ सीमित काटो,
इस मासिक फसल के कटते ही,प्रसाद सा सबको बांटो.
नववर्ष की पावन बेला पर,पत्नी ने की कुछ फरमाइस,
चलो पिया तुम हमें दिखा दो, फूल बाग में लगी नुमाइश.
जब से बजट हुआ है घोषित,कभी न की कोई फरमाइस,
कल शादी की वर्षगांठ है,करो पिया तुम पूरी ख्वाइस .
राजदूत से जाना होगा,मेघदूत में खाना होगा ,
प्रेमनगर का पान चबाकर,प्रेम दूत बन जाना होगा.
पेंग बढ़ाकर झूले होंगे, आसमान को छूते होंगे,
ऊंचा वाला झूला झूलेंगे,क्षण भर को दुखड़े भूलेंगे.
कुआं मौत का देखेंगे हम,उड़ता हुआ धुआं देखेंगे,
चारो ओर हों खेल तमाशे,बैठ खायेंगे चाट-बतासे.
पंजाबी एक सूट सिला दो,हाई हील का बूट दिला दो,
जयपुर वाला लंहगा ले दो,सस्ता नहीं कुछ मंहगा ले दो.
पप्पू की जिद पूरी कर दो,ले दो,दो पहिये की गाड़ी,
कब से आस लगाये हूं मैं,पिया दिला दो सिल्क की साड़ी.
कल शादी की वर्षगांठ पर,मुझको क्या दोगे उपहार,
या फिर मुझको बहला दोगे,डाल गले में बाहों का हार.
बन्द करो अपनी फरमाइस,ना जाना है हमें नुमाइस,
जितनी पूरी करते आओ,उतना बढ़ती जाती ख्वाइस.
नयावर्ष हैं वही मनाते,जिनका साल गया उन जैसा,
वर्षगांठ हैं वही मनाते ,जिनकी गांठ में होता पैसा.
अपनी तो है श्वेत कमाई,दो नंबरी मत बात करो तुम,
चादर से मत पैर निकालो,आडंबर की मत बात करो तुम.
लक्ष्मण रेखा सी बंधी हुई, है मेरी तनखा सीता .
मत आमंत्रण दो मंहगे रावण को,अपहृत हो जायेगी सीता.
प्यार भाव वाचक संज्ञा है,एहसासों की पावन गंगा है,
मत आंको इसे उपहारों से,दूषित होगी मनभावन गंगा है.
मेरे पास न सोना-चांदी,न है धन खान रतन ,
मैं तो केवल प्रेम पुजारी,अर्पित तुझ पर निर्मल मन.
कोई भौतिक चाह नहीं है,न मन में कोई और लगन,
बस यही कामना ईश्वर से,साथ रहें हम जनम-जनम.
अंतिम बात तुम्हें समझाता,ओ मेरे दिल की रानी ,
याद रखो तुम‘जय‘की बानी,उतना उतरो जितना पानी.
Credit: By Some Writer



November 3, 2009 at 8:35 PM
kya bat hai arun ji dil tak utar gye
November 3, 2009 at 11:34 PM
कोई भौतिक चाह नहीं है,न मन में कोई और लगन,
बस यही कामना ईश्वर से,साथ रहें हम जनम-जनम.
kaun rahna chahegi sath me [:P]
Its a great pleasure to see a entirely new version of akb. Nice composition
November 4, 2009 at 2:48 AM
Sorry doston..yaar niche kisne likha hai use bhi dekho plz.
I have a folder in which i publish poems written “by OTHERS”. Usi ke under ye poems hain.
So, please incourage them.Not me.
But keep reading.
Thanks