बांसुरी चली आवो
स्नेह ही निमंत्रण है
शब्द शब्द दर्पण है
प्रेम की एक प्रेरणा है
एक यही विश्वास है
उस परी की प्रेरणा है
सुर सजाता जाता हूँ
छबि है उसकी अनोखी
हर तान छेड़ जाता हूँ
बांसुरी को होठ की तलाश है
मोरनी को बादलों की प्यास है
है अमर यह प्रेम
मैं इसका निमंत्रण करता हूँ
बस तुम्हारे प्रेम पर मैं
प्राण अर्पण करता हूँ
तुम न आई आज सजनी
सुर सजा ना पाउँगा
शब्द साथ छोड़ देंगे
गीत गा न पाउँगा
रचनाकार : अरूण भारती ” घायल परींदा



April 7, 2008 at 8:14 AM
Tukbandi and shabd-chayan ke hisab se kafi achi kavita hai. Lekin kavita ka vishay kahin beech beech me khud se kafi jump kar raha hai….agar thode specific hote to kavita shayad jyada gudh ho sakti thi….baki bahut achi kavita hai…shubhkamnaye!!!!
April 8, 2008 at 2:34 AM
Tum na aai aaj sajni,
sur saja na paunga…..
Bahut sunder……
April 8, 2008 at 3:50 PM
बांसुरी को होठ की तलाश है
मोरनी को बादलों की प्यास है
is ghayl prinde ko ek sonpari ki sakt hi talash hai ,,,
wah ,,sahi hai